ईरानी महिला फुटबॉलरों का साहसिक विरोध: 5 खिलाड़ियों को ऑस्ट्रेलिया में मिली शरण
हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में आयोजित महिलाओं के एएफसी एशियन कप 2026 फुटबॉल टूर्नामेंट के दौरान एक ऐतिहासिक और साहसिक घटना देखने को मिली। ईरान की महिला फुटबॉल टीम ने अपने देश में महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंच का उपयोग करते हुए मौन विरोध दर्ज कराया। इस कड़े विरोध के परिणामस्वरूप, कड़े अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद 5 ईरानी महिला खिलाड़ियों को ऑस्ट्रेलिया में शरण (Asylum) मिल गई है।
विरोध की शुरुआत और इसके पीछे का कारण ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड राज्य के गोल्ड कोस्ट में 2 मार्च को ईरान और दक्षिण कोरिया की महिला टीमों के बीच एक मैच आयोजित हुआ था। मैच शुरू होने से पहले जब ईरान का राष्ट्रगान बजाया गया, तो ईरानी टीम की सभी खिलाड़ी चुपचाप खड़ी रहीं और उन्होंने राष्ट्रगान गाने से इनकार कर दिया। यह उनका मौन राजनीतिक विरोध था, जो मुख्य रूप से ईरान में हिजाब और बुर्का पहनने की अनिवार्यता, इस्लामिक कट्टरपंथ और महिलाओं की स्वतंत्रता पर लगी रोक के खिलाफ था।
ईरान में महिलाओं को विदेश जाने के लिए भी पति की अनुमति लेनी पड़ती है और कड़े ड्रेस कोड का पालन न करने पर 'मोरलिटी पुलिस' द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। इस विरोध को महसा अमीनी की घटना से भी जोड़कर देखा गया, जिनकी हिजाब विवाद के चलते पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी और वह ईरान में महिलाओं के विरोध की एक बड़ी नायिका बनकर उभरी थीं।
दबाव, मानसिक यातना और धमकियां इस मौन विरोध के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ईरानी खिलाड़ियों की खूब चर्चा हुई, लेकिन ईरान की नेशनल मीडिया ने इन खिलाड़ियों को 'जंग के समय गद्दार' करार दिया और देश लौटने पर कड़ी सजा दिए जाने की वकालत की। इसके बाद इन खिलाड़ियों पर भारी दबाव बनाया गया। 2 से 5 मार्च के बीच ईरानी स्टाफ द्वारा खिलाड़ियों को होटल में 'हाउस अरेस्ट' (नजरबंद) कर दिया गया और उन्हें किसी से मिलने नहीं दिया गया।
इसी भयंकर दबाव और परिवारजनों पर होने वाली हिंसा के डर के कारण, 5 मार्च (ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ) और 8 मार्च (फिलीपींस के खिलाफ) को हुए अगले मैचों में खिलाड़ियों को मजबूरी में राष्ट्रगान गाना पड़ा और वे बकायदा सैल्यूट करती हुई भी नजर आईं।
मदद की गुहार और डोनाल्ड ट्रंप का हस्तक्षेप जब 9 मार्च को यह टीम होटल से बाहर निकल रही थी, तो ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले ईरानी मूल के लोगों ने उनकी बस को घेर लिया और "हमारी बच्चियों को बचाओ" (Save our girls) के नारे लगाए। इसी दौरान एक महिला खिलाड़ी ने बस के अंदर से हाथ से 'सिग्नल फॉर हेल्प' (मदद मांगने का अंतरराष्ट्रीय इशारा) बनाया।
यह दृश्य देखकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया सक्रिय हो गया। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करते हुए ऑस्ट्रेलिया सरकार को चेतावनी दी कि यदि इन महिलाओं को वापस भेजा गया, तो यह एक भयानक मानवीय भूल (Terrible humanitarian mistake) होगी। ट्रंप ने घोषणा की कि यदि ऑस्ट्रेलिया इन्हें शरण नहीं देता, तो वह इन्हें अमेरिका बुला लेंगे।
ऑस्ट्रेलिया द्वारा 5 खिलाड़ियों को शरण इस बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव और मानवीय संकट को देखते हुए, ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने तुरंत कदम उठाया। ऑस्ट्रेलिया के गृह मंत्री टोनी बर्क ने घोषणा की कि जो 5 ईरानी महिला फुटबॉल खिलाड़ी ऑस्ट्रेलिया में रुकना चाहती हैं, उन्हें मानवीय आधार पर शरण दी जा रही है। टोनी बर्क ने स्पष्ट किया कि इन खिलाड़ियों का स्वागत है और यह कदम महिलाओं के खुलेपन की वकालत करने का प्रतीक है।
बाकी खिलाड़ियों का अनिश्चित भविष्य यद्यपि 5 खिलाड़ियों ने साहस दिखाते हुए ऑस्ट्रेलिया में शरण ले ली है, लेकिन टीम की बाकी 21 सदस्य (जिनमें अन्य खिलाड़ी और स्टाफ शामिल हैं) ईरान वापस लौट गए हैं। जब उनकी फ्लाइट रवाना होने वाली थी, तब भी लोगों ने उनकी बस को रोकने का प्रयास किया और सड़कों पर लेटकर उन्हें वापस जाने से बचाने की कोशिश की। अब इन लौटने वाले लोगों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं, क्योंकि उन्हें ईरान में कड़ी सजा और यातनाओं का सामना करना पड़ सकता है।
यह पूरी घटना न केवल खेल के मैदान पर अद्वितीय साहस का प्रतीक बनी है, बल्कि इसने ईरान में महिलाओं के अधिकारों के हनन और उनके संघर्ष को एक बार फिर पूरी दुनिया के सामने मजबूती से रख दिया है।







