हिंद महासागर में बढ़ता तनाव: ईरानी युद्धपोत पर अमेरिकी हमला और कूटनीतिक हलचल
हिंद महासागर में हाल ही में एक बड़ी सैन्य घटना घटी है, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव को काफी बढ़ा दिया है। अमेरिका की एक पनडुब्बी ने टॉर्पिडो से हमला कर ईरान के युद्धपोत 'आईआरआईएस देना' (IRIS Dena) को डुबो दिया है, जिसमें लगभग 100 लोगों के मारे जाने की खबर सामने आई है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह एक अभूतपूर्व घटना मानी जा रही है, जब किसी जहाज को टॉर्पिडो से निशाना बनाकर पूरी तरह डुबो दिया गया हो।
भारत का 'मिलान युद्ध अभ्यास' और जहाजों की वापसी भारत के विशाखापट्टनम तट पर नौसेना का 13वां 'मिलान युद्ध अभ्यास' (Milan Exercise) आयोजित किया गया था, जिसमें 70 से अधिक देशों ने अपने युद्धपोतों और नौसैनिकों के साथ हिस्सा लिया था। इस अभ्यास में ईरान ने भी अपने तीन जहाजों— आईआरआईएस देना, आईआरआईएस बुशहर और आईआरआईएस लावन के साथ भागीदारी की थी। जब यह अभ्यास समाप्त हुआ और ईरानी जहाज श्रीलंका के रास्ते वापस लौट रहे थे, उसी दौरान अमेरिका ने 'देना' को अंतरराष्ट्रीय सीमा में निशाना बनाया।
बचे हुए जहाजों को भारत और श्रीलंका में शरण 'देना' के डूबने और पानी में बढ़ते खतरे को देखते हुए, बाकी दोनों ईरानी जहाजों ने सुरक्षित तटों का रुख किया। 'आईआरआईएस लावन' ने मानवीय सहायता और तकनीकी खराबी का हवाला देते हुए 28 फरवरी को ही भारत से मदद मांगी थी। भारत सरकार ने 1 मार्च को अनुमति दी और 4 मार्च (जिस दिन देना डूबा) को यह जहाज केरल के कोच्चि बंदरगाह पर आकर सुरक्षित रुक गया। इसी तरह, 'आईआरआईएस बुशहर' ने डिस्ट्रेस कॉल भेजकर श्रीलंका से शरण मांगी और श्रीलंका सरकार ने भी तत्परता दिखाते हुए उसे अपने यहां रुकने की इजाजत दे दी।
बचाव अभियान और भारत की घरेलू राजनीति इस घटना को लेकर भारत में राजनीतिक बयानबाजी भी देखने को मिली। विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया कि भारत में अभ्यास के लिए आए जहाज को वापस लौटते समय मरने के लिए छोड़ दिया गया और कोई मदद नहीं भेजी गई। इसके जवाब में भारत सरकार और भारतीय नौसेना ने स्पष्ट किया कि घटना भारतीय तट से 250 नॉटिकल मील दूर हुई थी और श्रीलंका इसके अधिक करीब था। इसके बावजूद, जैसे ही मदद की गुहार मिली, भारतीय नौसेना ने 4 मार्च की सुबह ही अपना लॉन्ग रेंज मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट श्रीलंका की ओर भेज दिया था। इसके अलावा, आईएनएस तरंगिणी और कोच्चि के पास मौजूद आईएनएस इक्षक को भी बचाव कार्यों और लापता लोगों को ढूंढने के लिए तुरंत घटनास्थल पर भेजा गया था।
श्रीलंका की सराहनीय भूमिका इस संकट की घड़ी में श्रीलंका का योगदान अत्यंत मानवीय और सराहनीय रहा। श्रीलंका ने खुद को युद्ध में गुटनिरपेक्ष और तटस्थ बताते हुए अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन किया। श्रीलंका ने न केवल ईरानी पोत को डॉक करने की अनुमति दी, बल्कि डूबते हुए जहाज से 32 ईरानी नाविकों को सुरक्षित निकालकर अपने देश में शरण भी दी।
कूटनीतिक प्रतिक्रियाएँ इस घटना ने अमेरिका और ईरान के बीच जुबानी जंग को तेज कर दिया है। अमेरिका ने जहां इसे अपनी एक बड़ी उपलब्धि बताया है और ईरान पर अब तक का सबसे बड़ा हमला करने की धमकी दी है, वहीं ईरान के रक्षा मंत्री ने इसे पूरी तरह से अस्वीकार्य बताते हुए सही समय पर जवाब देने की बात कही है। भारत में चल रहे 11वें 'रायसीना डायलॉग' (Raisina Dialogue) में आए ईरान के उपविदेश मंत्री ने भी बिना हथियारों वाले जहाज को निशाना बनाने की निंदा की और कहा कि भारत को अमेरिका से इस बारे में सवाल करना चाहिए। इन सब के बीच, भारत के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया है कि भारत संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून (UNCLOS) के नियमों का पालन करते हुए अंतरराष्ट्रीय जल में मानवीय सहायता प्रदान कर रहा है और भारत ने अपनी जिम्मेदारियों को पूरी तरह से निभाया है।







