खाड़ी देशों के तनाव का भारत पर असर: क्या देश में होने वाली है तेल और गैस की किल्लत?
खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रहे मौजूदा युद्ध और तनाव का सीधा असर भारत और आम आदमी की जेब पर पड़ने की आशंका पैदा हो गई है। इस अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण कच्चे तेल और गैस की सप्लाई चेन बुरी तरह बाधित हुई है, जिससे भारत में ईंधन की कीमतों में उछाल आने की चर्चा तेज है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर संकट इस संकट का मुख्य कारण ईरान द्वारा 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) पर नियंत्रण करना है, जिसके चलते गल्फ से एशिया की ओर आने वाले हजारों तेल और गैस के टैंकर समुद्र में फंस गए हैं। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है; दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 85% तेल आयात करता है, और भारत की 55% तेल सप्लाई अकेले इसी हॉर्मुज मार्ग से होकर आती है। इस 'चोक पॉइंट' के बाधित होने से जहाजों की आवाजाही रुक गई है।
कतर से गैस सप्लाई पर रोक स्थिति तब और चुनौतीपूर्ण हो गई जब भारत को गैस सप्लाई करने वाले सबसे बड़े स्रोत कतर ने अपनी एलएनजी (Liquefied Natural Gas) के उत्पादन और परिवहन को रोक दिया। कतर का यह कदम भारत से किसी विवाद के कारण नहीं, बल्कि युद्ध क्षेत्र में गैस परिवहन के उच्च जोखिम (विस्फोट के खतरे) को देखते हुए उठाया गया है। भारत अपनी जरूरत की 54% एलएनजी गल्फ देशों से मंगाता है, जिसमें 40% की आपूर्ति अकेले कतर करता है। अगर यह सप्लाई लंबे समय तक बाधित रहती है, तो देश में गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाली सीएनजी (CNG), घरों में आने वाली पीएनजी (PNG) और एलपीजी (LPG) गैस के दाम बढ़ सकते हैं।
क्या भारत के पास सिर्फ 25 दिन का तेल बचा है? हाल ही में यह खबर चर्चा का विषय बनी कि भारत के पास आपातकाल के लिए केवल 25 दिन का क्रूड ऑयल (कच्चा तेल) रिजर्व बचा है। हालांकि, असल तस्वीर कुछ और है। भारत सरकार और पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, देश के पास वास्तव में लगभग 74-75 दिन का तेल सुरक्षित है।
इसे इस तरह समझा जा सकता है:
- भारत की सरकारी और प्राइवेट रिफाइनरी कंपनियां अपने पास हमेशा 60 से 65 दिन का एडवांस स्टॉक रखती हैं ताकि रिफाइनिंग और बिक्री का काम निर्बाध चलता रहे।
- इसके अलावा, 1990 के खाड़ी युद्ध (जब भारत के पास सिर्फ 3 दिन का तेल बचा था) से सबक लेते हुए देश ने 'स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व' (SPR) बनाए। वर्तमान में विशाखापटनम, मंगलुरु और पादुर में बने इन रिजर्व्स में 9 से 10 दिन का तेल भरा हुआ है। इन दोनों को मिलाकर देश के पास पर्याप्त बैकअप मौजूद है, जो किसी भी आपात स्थिति से निपटने में मददगार होगा।
भारत की रणनीतिक तैयारी और वैकल्पिक स्रोत राहत की बात यह है कि भारत अब केवल गल्फ देशों पर निर्भर नहीं है। भारत ने कूटनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए अपने तेल आयात को डायवर्सिफाई किया है और आज 40 से अधिक देशों से तेल खरीदता है।
- रूस का विकल्प: इस संकट के समय में रूस भारत के लिए एक बड़े विकल्प के रूप में तैयार है। रूस वर्तमान में भारत का तीसरा सबसे बड़ा ऑयल सप्लायर है और उसने जरूरत पड़ने पर सप्लाई जारी रखने के संकेत दिए हैं।
- वेनेजुएला का तेल: अमेरिका के हालिया हस्तक्षेप के बाद वेनेजुएला का तेल भी वैश्विक बाजार में दोबारा 'फ्री फ्लो' के लिए उपलब्ध हो गया है, जो भारत के लिए एक और नया विकल्प खोलता है।
निष्कर्ष यद्यपि मध्य पूर्व का यह तनाव भारत के आयात (तेल/गैस) और गल्फ देशों को होने वाले 28 बिलियन डॉलर के निर्यात दोनों को प्रभावित कर रहा है, लेकिन सरकार की दूरदर्शी नीतियों, स्ट्रैटेजिक रिजर्व्स और रूस तथा वेनेजुएला जैसे वैकल्पिक स्रोतों की वजह से भारत इस ऊर्जा संकट का सामना करने के लिए तैयार दिख रहा है







