मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव: 'ग्रेटर इजराइल' का विवाद और अरब देशों का आक्रोश
हाल ही में मध्य पूर्व (Middle East) में इजराइल और अमेरिका के खिलाफ भारी कूटनीतिक आक्रोश देखने को मिल रहा है। यह तनाव ऐसे समय में चरम पर है जब भारतीय प्रधानमंत्री इजराइल की महत्वपूर्ण यात्रा पर जाने वाले हैं। इस पूरे विवाद के केंद्र में इजराइल का विस्तारवाद और एक अमेरिकी राजनयिक का भड़काऊ बयान है।
विवाद की जड़: अमेरिकी राजदूत का बयान इस पूरे विवाद की शुरुआत इजराइल में नियुक्त अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी के एक विवादास्पद बयान से हुई। हकाबी ने प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार टकर कार्लसन को दिए एक इंटरव्यू में इजराइल का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि यदि इजराइल चाहे तो वह मिस्र की नील नदी (Nile River) से लेकर इराक और सीरिया में बहने वाली यूफ्रेटस (फरात) नदी तक के पूरे क्षेत्र पर कब्जा कर सकता है। माइक हकाबी खुद एक कट्टर इजराइल समर्थक और ईसाई धर्म को मानने वाले नेता हैं, जो अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के बड़े चेहरे रहे हैं। उनके इस बयान को सीधे तौर पर अमेरिकी मंशा के रूप में देखा जा रहा है।
क्या है 'ग्रेटर इजराइल' (Greater Israel) का कांसेप्ट? नील नदी से लेकर यूफ्रेटस नदी तक के इस विशाल क्षेत्र को 'ग्रेटर इजराइल' के रूप में जाना जाता है। इसके पीछे का मुख्य आधार धार्मिक मान्यताएं हैं। यहूदी, ईसाई और मुस्लिम, तीनों ही धर्मों को इब्राहिम (Abraham) का वंशज माना जाता है। इजराइलियों के धार्मिक ग्रंथ (तोराह/बाइबल) के अनुसार, इब्राहिम के पुत्र इसहाक के वंशजों (यहूदियों) के लिए यह पूरी जगह 'प्रॉमिस्ड लैंड' (ईश्वर द्वारा दी गई भूमि) है।
अगर 'ग्रेटर इजराइल' के इस नक्शे को देखा जाए, तो इसमें मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, इराक, सऊदी अरब के कुछ हिस्से और कुवैत जैसे कई छोटे-बड़े देश शामिल हो जाते हैं। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी अक्सर 'ग्रेटर इजराइल' बसाने के अपने मिशन का जिक्र करते रहे हैं।
अरब और मुस्लिम देशों में उबाल इस बयान के बाद सऊदी अरब, मिस्र, जॉर्डन और कतर सहित 13 मुस्लिम देशों के विदेश मंत्रालयों ने कड़ी आपत्ति जताते हुए इसका विरोध किया है। हालांकि, इन अरब देशों की जनता सोशल मीडिया पर अपने ही राष्ट्रध्यक्षों की कड़ी आलोचना कर रही है। जनता का मानना है कि इन नेताओं ने ट्रंप के 'गाजा पीस प्लान' और गाजा के पुनर्निर्माण के नाम पर 7 बिलियन डॉलर देकर फिलिस्तीन का सौदा कर लिया है।
जमीनी हकीकत: वेस्ट बैंक पर इजराइल का बढ़ता नियंत्रण विवाद केवल बयानों तक सीमित नहीं है। इजराइल ने फिलिस्तीन के हिस्से वाले वेस्ट बैंक के 60% इलाके पर कब्जा करने की योजना लागू कर दी है। इजराइल ने इस क्षेत्र में जमीनों की रजिस्ट्री शुरू करवा दी है और स्थानीय लोगों से कहा है कि यदि उनके पास जमीन के कागजात नहीं हैं, तो उन्हें वह जगह छोड़नी पड़ेगी।
भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती ऐसे समय में जब मध्य पूर्व में इतना तनाव है, भारतीय प्रधानमंत्री की इजराइल यात्रा के कई कूटनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू क्षेत्रीय स्थिरता के नाम पर 6 देशों का एक 'एंटी-रेडिकल एक्सिस' (कट्टरपंथ विरोधी धुरी) बनाने की योजना बना रहे हैं, जिसमें ग्रीस, साइप्रस और भारत को शामिल करने की उम्मीद जताई जा रही है। इसके जरिए इजराइल तुर्की और ईरान जैसे देशों को साधना चाहता है।
हालांकि, भारत के लिए यह एक मुश्किल कूटनीतिक परीक्षा है। भारत की नीति हमेशा 'सबका साथ सबका विकास' की रही है और उसे इजराइल व अमेरिका के साथ-साथ ईरान और 140 करोड़ भारतीयों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए अरब देशों के साथ भी अपने संबंधों को संतुलित करना है। ईरान के खिलाफ किसी गुट में शामिल होना भारत की मौजूदा विदेश नीति के खिलाफ जा सकता है।
संक्षेप में, अमेरिकी राजदूत के एक बयान और 'ग्रेटर इजराइल' की महत्वकांक्षाओं ने मध्य पूर्व की राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है, जिसके वैश्विक परिणाम आने वाले समय में स्पष्ट होंगे।







