डोनाल्ड ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ पीस': वैश्विक राजनीति में नया बदलाव और भारत का कूटनीतिक रुख
प्रस्तावना अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक राजनीति, विशेषकर मध्य पूर्व (Middle East) में शांति और पुनर्निर्माण के नाम पर 'बोर्ड ऑफ पीस' (Board of Peace) नामक एक नए अंतरराष्ट्रीय समूह का गठन किया है। 19 फरवरी को वाशिंगटन डीसी में इस समूह की पहली आधिकारिक बैठक आयोजित की गई। विशेषज्ञों द्वारा इस कदम को संयुक्त राष्ट्र (UN) के समानांतर एक नई वैश्विक संस्था खड़ी करने और दुनिया भर के मामलों पर अमेरिकी निगरानी बढ़ाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
बोर्ड ऑफ पीस: उद्देश्य और गाजा के लिए फंड इस बोर्ड का तात्कालिक उद्देश्य युद्धग्रस्त गाजा का पुनर्निर्माण करना है। इजराइल के हमलों के बाद गाजा की 78% इमारतें मलबे में तब्दील हो चुकी हैं और 66,000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। वाशिंगटन में हुई बैठक में गाजा के पुनर्निर्माण के लिए कुल 17 बिलियन डॉलर (लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये) के फंड की घोषणा की गई। इसमें से 10 बिलियन डॉलर अकेले अमेरिका देगा, जबकि शेष 7 बिलियन डॉलर 9 अन्य देश (यूएई, सऊदी अरब, कतर, मोरक्को आदि) मिलकर देंगे। इस पहल के तहत शुरुआती चरण में 5 लाख लोगों के लिए 1 लाख घर बनाने, सड़कें, अस्पताल और अन्य बुनियादी ढांचे विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
इसके अलावा, गाजा में निरस्त्रीकरण और शांति स्थापित करने के लिए एक 'इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स' का गठन किया जा रहा है। इस फोर्स के लिए मोरक्को, अल्बानिया, इंडोनेशिया, कजाकिस्तान और कोसोवो ने अपने 8,000 सैनिक भेजने पर सहमति जताई है। इस सेना का नेतृत्व एक अमेरिकी मेजर जनरल जेस्पर जेफर्स करेंगे।
भारत का रुख: पूर्ण सदस्यता से दूरी, 'ऑब्जर्वर' की भूमिका इस बैठक के लिए 60 देशों को निमंत्रण भेजा गया था, लेकिन कई प्रमुख यूरोपीय देशों (जैसे फ्रांस, जर्मनी, यूके, इटली) ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया।
भारत ने भी पूर्ण सदस्यता लेने से परहेज किया, लेकिन पूरी तरह से इसका बहिष्कार भी नहीं किया। भारत ने वाशिंगटन डीसी में तैनात अपनी वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी और उपराजदूत (Charge d'Affaires) नमगिया सी खंपा को एक 'ऑब्जर्वर' (समीक्षक) के रूप में भेजा। भारत का यह सतर्क कदम उसकी दीर्घकालिक कूटनीतिक नीतियों का हिस्सा है:
• 'टू-नेशन थ्योरी' का समर्थन: भारत हमेशा से इजराइल और फिलिस्तीन के सह-अस्तित्व (Two-Nation Solution) का पक्षधर रहा है। भारत को आशंका है कि यदि यह बोर्ड भविष्य में कोई ऐसा फैसला लेता है जिससे फिलिस्तीन का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाए, तो इसका असर भारत की छवि और घरेलू राजनीति पर पड़ेगा।
• निगरानी और संतुलन: पूर्ण सदस्य बने बिना एक ऑब्जर्वर भेजकर, भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि वह इस समूह के फैसलों पर नजर रख सके और अमेरिकी दबाव को भी कूटनीतिक रूप से संतुलित कर सके।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का दोहरा मापदंड और मुस्लिम देश इस समूह का गठन कई कूटनीतिक अंतर्विरोधों को भी उजागर करता है। इजराइल, जो गाजा पर हमलों के लिए जिम्मेदार है, इस बोर्ड का एक स्थायी सदस्य (Permanent Member) बन गया है। वहीं, जिस फिलिस्तीन पर हमला हुआ है, उसका इस समूह में कहीं कोई नाम नहीं है। हैरानी की बात यह है कि सऊदी अरब, यूएई, कतर, तुर्की और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देश—जो आम तौर पर फिलिस्तीन के मुखर समर्थक माने जाते थे—अब इजराइल के साथ इस समूह में शामिल हो गए हैं। इस घटनाक्रम ने इन देशों की अवसरवादी नीतियों को बेनकाब कर दिया है।
पाकिस्तान की अवसरवादिता पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ भी इस बैठक में शामिल हुए। हालांकि, पाकिस्तान ने गाजा के लिए न तो कोई फंड दिया और न ही अपनी सेना भेजने की पेशकश की। इसके बजाय, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री मंच पर अमेरिकी राष्ट्रपति की चापलूसी करते और उन्हें "दक्षिण एशिया का उद्धारकर्ता" तथा "मैन ऑफ पीस" कहते नज़र आए, जिसके लिए उन्हें सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल भी किया गया।
निष्कर्ष डोनाल्ड ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ पीस' मूल रूप से गाजा के पुनर्निर्माण की आड़ में मध्य पूर्व पर नियंत्रण हासिल करने की एक अमेरिकी रणनीति प्रतीत होती है। संयुक्त राष्ट्र (UN) की गिरती प्रासंगिकता के बीच, यह समूह खुद को एक वैश्विक मध्यस्थ के रूप में स्थापित करना चाहता है। हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह बोर्ड वास्तव में संघर्ष विराम करवा पाएगा या यह केवल अमेरिकी वर्चस्व कायम करने का एक नया उपकरण बनकर रह जाएगा। दूसरी तरफ, भारत का 'ऑब्जर्वर' के रूप में शामिल होना, उसके स्वतंत्र और भविष्योन्मुखी विदेश नीति का एक बेहतरीन उदाहरण है।







