संसद में गतिरोध: लोकतंत्र का मंदिर या 'वायरल फुटेज' का मंच?
भारतीय संसद का बजट सत्र चल रहा है, लेकिन सदन के भीतर जो कुछ घटित हो रहा है, उसने देश के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव (Motion of Thanks) एक महत्वपूर्ण संसदीय परंपरा है, लेकिन इस बार 22 वर्षों (2004 के बाद) में पहली बार ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री ने लोकसभा में अपना जवाब नहीं दिया।
लोकसभा में प्रधानमंत्री का संबोधन क्यों नहीं?
परंपरागत रूप से, धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब प्रधानमंत्री देते हैं, जिसके माध्यम से सरकार अपना विजन देश के सामने रखती है। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में भाषण नहीं दिया, बल्कि राज्यसभा में अपनी बात रखी।
लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिरला ने इसका कारण प्रधानमंत्री की 'सुरक्षा' को बताया। दरअसल, विपक्ष की कुछ महिला सांसदों ने प्लेकार्ड और बैनर लेकर प्रधानमंत्री की सीट को घेर लिया था। स्पीकर का मानना था कि सदन का माहौल ऐसा था जहां प्रधानमंत्री की सुरक्षा के साथ समझौता हो सकता था या कोई अप्रत्याशित घटना (जैसे स्याही फेंकना या धक्का-मुक्की) हो सकती थी। संसदीय कार्य मंत्री ने भी प्रधानमंत्री को सलाह दी कि वे सदन के भीतर न आएं, जिसके बाद प्रधानमंत्री सीधे राज्यसभा चले गए।
विपक्ष के मुद्दे: अनपब्लिश्ड किताब और ट्रेड डील
सदन में हंगामे की मुख्य वजह विपक्ष द्वारा उठाए गए दो मुद्दे थे, जो बजट या राष्ट्रपति के अभिभाषण से इतर थे:
1. जनरल नरवणे की अनपब्लिश्ड किताब: विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे की एक किताब (जो अभी प्रकाशित नहीं हुई है) के अंश का हवाला दिया। इसमें चीन के मुद्दे पर प्रधानमंत्री द्वारा कथित तौर पर कहा गया था, "जो उचित समझो, वो करो" (Do whatever you feel is appropriate)। विपक्ष ने इसे प्रधानमंत्री द्वारा जिम्मेदारी से पीछे हटना बताया, जबकि सत्ता पक्ष का तर्क था कि यह सेना पर सरकार के भरोसे को दर्शाता है।
2. ट्रेड डील और विदेशी आरोप: विपक्ष ने आरोप लगाया कि अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील और कुछ विदेशी फाइलों (एप्स्टीन फाइल्स) में नाम आने के डर से सरकार दबाव में काम कर रही है। विपक्ष ने सवाल उठाया कि डील की शर्तों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया।
सांसद या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर?
सदन की कार्यवाही को देखने पर यह प्रतीत होता है कि माननीय सांसद अब 'लॉ-मेकर' (कानून निर्माता) से ज्यादा 'इन्फ्लुएंसर' की भूमिका में नजर आ रहे हैं। ऐसा लगता है कि सांसदों का उद्देश्य सदन में बहस करना नहीं, बल्कि कैमरा फुटेज हासिल करना और सोशल मीडिया पर वायरल होना रह गया है।
सदन के भीतर तख्तियां लहराना, शोर मचाना और कार्यवाही को बाधित करना अब एक सामान्य प्रक्रिया बन गई है। स्पीकर के चैंबर में भी, जहां आमतौर पर कैमरे नहीं होते और शांति से बात होती है, वहां से भी खबरें और वीडियो बाहर आने लगे हैं, जो दर्शाता है कि हर पल को 'कंटेंट' की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
जनता के पैसे की बर्बादी और असली सवालों की अनदेखी
संसद के एक मिनट की कार्यवाही पर देश के टैक्सपेयर का लगभग 2.5 लाख रुपये खर्च होता है। इस सत्र में हंगामे के चलते 19 घंटे से अधिक का समय बर्बाद हुआ।
चिंताजनक बात यह है कि जिस समय देश को बजट, शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा की उम्मीद थी, उस समय सदन 'अनपब्लिश्ड किताबों' और व्यक्तिगत आरोपों के शोर में डूब गया। क्या विपक्ष ने सरकार से यह पूछा कि शिक्षा या स्वास्थ्य का बजट कम क्यों है? क्या अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए फंड पर सवाल हुए? नहीं, पूरा फोकस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पर रहा।
निष्कर्ष: क्या लाइव टेलीकास्ट बंद होना चाहिए?
आज की स्थिति को देखते हुए एक विचारणीय सुझाव यह भी सामने आता है कि क्या सदन की कार्यवाही का लाइव प्रसारण (Live Telecast) बंद कर देना चाहिए? जब सांसदों को पता होता है कि वे कैमरे पर हैं, तो वे अपने मतदाताओं को दिखाने के लिए अधिक आक्रामक प्रदर्शन करते हैं।
शायद सचिवालय की तरह संसद में भी काम रिकॉर्ड किया जाए और सत्र खत्म होने के बाद उसे जारी किया जाए, ताकि यह 'परफॉर्मेंस' की जगह न बने। अंततः, देश को यह तय करना होगा कि उसे संसद में अपने प्रतिनिधियों से 'वायरल वीडियो' चाहिए या देश की नीतियों पर गंभीर चिंतन।







