मणिपुर: नई सरकार के गठन के बाद फिर क्यों सुलग उठा राज्य? कुकी विधायकों के खिलाफ विद्रोह की पूरी कहानी
भारत का पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर एक बार फिर सुर्खियों में है। उम्मीद थी कि एक साल लंबे राष्ट्रपति शासन के बाद नई सरकार का गठन राज्य में शांति लाएगा, लेकिन जैसे ही नई सरकार ने शपथ ली, राज्य के कई हिस्सों में फिर से विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। इस बार यह विरोध सरकार के खिलाफ तो है ही, लेकिन उससे भी ज्यादा यह कुकी समुदाय के उन विधायकों के खिलाफ है जो इस सरकार में शामिल हुए हैं।
क्या है मौजूदा स्थिति? फरवरी में मणिपुर से राष्ट्रपति शासन हटाया गया और एक नई सरकार का गठन हुआ। यमनाम खेमचंद सिंह (मैतेई समुदाय) ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। सत्ता में संतुलन बनाए रखने के लिए दो उपमुख्यमंत्री भी बनाए गए—नेमचा किपजेन (कुकी समुदाय) और एल. दीखो (नागा समुदाय)।
जैसे ही यह खबर फैली कि कुकी विधायक सरकार में शामिल हो गए हैं, चुराचांदपुर और कांगपोकपी जैसे कुकी बहुल जिलों में भारी विरोध शुरू हो गया। लोग सड़कों पर उतर आए, और सुरक्षा बलों के साथ झड़पें हुईं।
अपने ही नेताओं के 'सिर पर इनाम' क्यों? इस बार के प्रदर्शन का स्वरूप बेहद चौंकाने वाला है। कुकी समुदाय के लोग अपने ही नेताओं को "गद्दार" मान रहे हैं। हालात इतने तनावपूर्ण हैं कि प्रदर्शनकारियों ने नवनियुक्त उपमुख्यमंत्री नेमचा किपजेन पर 20 लाख रुपये और अन्य कुकी विधायकों पर 10 लाख रुपये तक के इनाम की घोषणा कर दी है।
इसका मुख्य कारण 13 जनवरी को पास किया गया एक प्रस्ताव (Resolution) है। कुकी संगठनों ने 'लांगोल रेजोल्यूशन' पास किया था, जिसमें तय हुआ था कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जातीं, कोई भी कुकी विधायक सरकार में शामिल नहीं होगा। लेकिन अगले ही दिन, 14 जनवरी को विधायक सरकार में शामिल हो गए, जिसे समुदाय ने अपने साथ धोखा माना।
कुकी समुदाय की असल मांग क्या है? आमतौर पर राज्य "पूर्ण राज्य" (Statehood) का दर्जा मांगते हैं, लेकिन मणिपुर में कुकी समुदाय की मांग इससे उलट है। वे मणिपुर सरकार (जिसमें मैतेई बहुल है) के अधीन रहने के बजाय सीधे केंद्र के अधीन रहना चाहते हैं।
कुकी समुदाय की मांग है कि उनके लिए एक अलग "यूनियन टेरिटरी विद लेजिस्लेचर" (विधानमंडल वाला केंद्र शासित प्रदेश) बनाया जाए, ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली या पुडुचेरी में व्यवस्था है। वे चाहते हैं कि उनके पहाड़ी क्षेत्रों का प्रशासन अलग हो और उनका अपना मुख्यमंत्री हो, ताकि मैतेई समुदाय का उन पर शासन न हो।
संघर्ष की जड़: घाटी बनाम पहाड़ मणिपुर की समस्या को समझने के लिए इसकी भौगोलिक स्थिति को समझना जरूरी है:
1. भूगोल और आबादी: मणिपुर का मध्य भाग (इंफाल घाटी) समतल है, जहां मैतेई समुदाय (बहुसंख्यक) रहता है। चारों ओर पहाड़ी इलाका है, जो राज्य का लगभग 90% हिस्सा है, जहां कुकी और नागा जनजातियां (अल्पसंख्यक) रहती हैं।
2. जमीन का विवाद: कानून के मुताबिक, मैतेई लोग पहाड़ी इलाकों में जमीन नहीं खरीद सकते, जबकि पहाड़ी जनजातियां (कुकी-नागा) घाटी में बस सकती हैं। मैतेई समुदाय लंबे समय से एसटी (ST) दर्जे की मांग कर रहा है ताकि वे भी पहाड़ों में जमीन ले सकें, जिसका कुकी समुदाय विरोध करता है।
3. अतिक्रमण और नशा कारोबार: सरकार का आरोप है कि पहाड़ों में संरक्षित वन क्षेत्रों में अवैध कब्जा और अफीम की खेती हो रही है, जिसे हटाने के लिए सरकार कदम उठा रही है। कुकी समुदाय इसे अपनी जमीन पर हमला मानता है।
निष्कर्ष केंद्र सरकार ने मणिपुर में सभी पक्षों (मैतेई, कुकी, नागा) को सत्ता में भागीदारी देकर शांति स्थापित करने की कोशिश की थी। लेकिन कुकी समुदाय का यह मानना है कि मौजूदा व्यवस्था में उनकी स्वायत्तता की मांग पूरी नहीं हो रही है। यही कारण है कि अपने ही विधायकों द्वारा मंत्री पद स्वीकार करने को उन्होंने विश्वासघात माना है और राज्य एक बार फिर अस्थिरता के दौर में प्रवेश कर गया है।







