वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव: अमेरिका के F-47 का मजाक और जर्मनी का सैन्य उदय
परिचय आज की दुनिया में शक्ति के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। एक तरफ अमेरिका अपनी 'एयर सुपीरियरिटी' (वायु वर्चस्व) बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है, तो दूसरी तरफ यूरोप में जर्मनी अपनी सेना को फिर से मजबूत करने की राह पर है। हालिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि चीन ने अमेरिका के महत्वाकांक्षी फाइटर जेट प्रोग्राम का मजाक उड़ाया है, वहीं अमेरिका के पुराने सहयोगी जर्मनी ने अपनी सुरक्षा के लिए अब खुद पर निर्भर होने का फैसला किया है।
1. अमेरिका का 'F-47' प्रोग्राम और चीन की चुनौती
अमेरिका ने अपनी वायु शक्ति को अगले स्तर पर ले जाने के लिए 'नेक्स्ट जनरेशन एयर डोमिनेंस' (NGAD) प्रोग्राम के तहत F-47 फाइटर जेट पर काम शुरू किया है। डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल में इस प्रोजेक्ट पर काफी जोर दिया है, क्योंकि वह अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति हैं, इसलिए इसका नाम F-47 रखा गया।
हालाँकि, इस प्रोजेक्ट को लेकर चीन और खुद अमेरिका के भीतर भी सवाल उठ रहे हैं:
• चीन का दावा: चीनी स्टेट मीडिया 'ग्लोबल टाइम्स' ने F-47 के डिजाइन का मजाक उड़ाया है। चीन का कहना है कि यह डिजाइन त्रुटिपूर्ण (flawed) है और इसमें 'वर्टिकल टेल' (Vertical Tail) न होने के कारण इसकी मजबूती कम होगी। चीन ने दावा किया है कि अमेरिका तकनीक की रेस में पिछड़ रहा है, जबकि चीन ने 2024 में ही अपने J-36 और J-50 जैसे सिक्स्थ जनरेशन फाइटर जेट्स का प्रोग्राम लॉन्च कर दिया था।
• अमेरिका का पक्ष: यूएस एयरफोर्स का दावा है कि F-47 की क्षमताएं अद्वितीय होंगी। इसकी कॉम्बैट रेडियस (Combat Radius) 1000 नॉटिकल माइल्स (लगभग 1800 किमी) से अधिक होगी, जो F-22 रैप्टर (590 नॉटिकल माइल्स) से लगभग दोगुनी है। इसमें 'स्टेल्थ प्लस प्लस' (Stealth++) टेक्नोलॉजी और 2 मैक (Mach 2) की स्पीड होने का दावा किया गया है।
• बोइंग की विश्वसनीयता: इस प्रोजेक्ट का कॉन्ट्रैक्ट बोइंग (Boeing) को दिया गया है, जिसे चीन और कई एक्सपर्ट्स एक 'अनरिलायबल' (अविश्वसनीय) कॉन्ट्रैक्टर मानते हैं। खुद डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में संकेत दिए हैं कि वे F-47 नाम से '47' हटा सकते हैं और खुद को इस प्रोजेक्ट से अलग कर सकते हैं क्योंकि इसके डिजाइन में कमियां बताई जा रही हैं।
2. जर्मनी का सैन्यीकरण: क्या तीसरा विश्व युद्ध 'लोड' हो रहा है?
यूरोप में भी भारी उथल-पुथल मची हुई है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले जर्मनी ने अब यूरोप की सबसे शक्तिशाली 'कन्वेंशनल आर्मी' (Conventional Army) बनाने का फैसला किया है।
• अमेरिका पर अविश्वास: जर्मनी के इस कदम के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका पर भरोसा कम होना है। डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों, जैसे ग्रीनलैंड को खरीदने की बात करना या नाटो (NATO) के भविष्य पर सवाल उठाना, ने यूरोप को डरा दिया है। जर्मनी को लगता है कि अमेरिका अब भरोसेमंद साथी नहीं रहा और वह अपने हितों के लिए यूरोप के खिलाफ भी जा सकता है।
• रूस का खतरा: यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप में यह डर बैठ गया है कि रूस का अगला निशाना पोलैंड या जर्मनी हो सकते हैं। नाटो पर रूस के संभावित हमले (2029 तक) की आशंकाओं के चलते जर्मनी अपनी सुरक्षा खुद अपने हाथ में लेना चाहता है।
• इतिहास की परछाई: जर्मनी द्वारा सेना बढ़ाना दुनिया के लिए चिंता का विषय भी है। इतिहास गवाह है कि जब भी जर्मनी ने अपनी सैन्य ताकत बढ़ाई है (जैसे हिटलर के समय), दुनिया को विश्व युद्ध का सामना करना पड़ा है। हालांकि, आज जर्मनी के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, लेकिन वह अपनी सेना को आधुनिक बनाने के लिए भारी निवेश कर रहा है और सैनिकों को ऊंची तनख्वाह (Salary) ऑफर कर रहा है।
निष्कर्ष
वर्तमान हालात यह इशारा कर रहे हैं कि दुनिया 'यूनिपोलर' (अमेरिका केंद्रित) से हटकर बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। एक तरफ चीन अमेरिका की तकनीकी खामियों को उजागर कर रहा है, तो दूसरी तरफ जर्मनी जैसा सहयोगी देश अमेरिका की छत्रछाया से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र सैन्य शक्ति खड़ी कर रहा है। हथियारों की यह नई होड़ भविष्य में किसी बड़े संघर्ष का संकेत हो सकती है







